विपक्षी एकता में सेंध लगाकर राज्यसभा का उपसभापति पद जीती भाजपा, क्या विपक्षी एकता आकार के पायेगी ?

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राज्यसभा उपसभापति चुनाव में राजग की ओर से जेडीयू उम्मीदवार हरिवंश सिंह ने सप्रंग की ओर से कांग्रेस उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को पटखनी दी । खास बात यह रही कि सदन में अल्पमत में होने के बाद भी राजग ने जीत के लिए जरूरी सीटों का जुगाड़ कर लिया । ऐसे में यह कह सकते है कि विपक्षी एकता अभी भी कायम नहीं हो पाई है । भले ही ये चुनाव राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए रहा हो, लेकिन इसके नतीजे का असर होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा ।

हरिवंश सिंह के उपसभापति चुने जाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘आज हम भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ मना रहे है । हरिवंश जी बलिया से आते हैं, जो जगह स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जानी जाती है । वे (हरिवंश) लोकनायक जयप्रकाश नारायण से प्रभावित हैं । उन्होंने वाराणसी में भी जिंदगी बिताई है । वे ऐसे नेता हैं जिन्होंने चंद्रशेखर जी के साथ काम किया है ।’

राज्यसभा में वर्तमान में कुल 244 सदस्य है । जिनमें
उपसभापति पद के मतदान में 232 सांसदों ने हिस्सा लिया । इनमें से 125 वोटों के साथ हरिवंश सिंह ने कांग्रेस के बीके हरिप्रसाद को ( 101 वोट ) हराया । इस दौरान दो सदस्य गैरहाजिर रहे और 16 सदस्यों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया । राज्यसभा में सत्ताधारी राजग 95 सीट के साथ बहुमत के आंकड़े के आस पास भी नहीं था । जबकि विपक्ष के पास सभी सहयोगी दलों को मिलाकर बहुमत के लिए पर्याप्त सीटें थी । पर विपक्ष एआईएडीएमके, बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति को अपने साथ जोड़े रखने में नाकाम रहा ।

राज्यसभा में उपसभापति पद पर कांग्रेस की इस हार और भाजपा की जीत ने मोदी के खिलाफ तथाकथित विपक्षी एकता की पोल खोल दी । इसका इशारा साफ है कि इस चुनाव का असर आने वाले लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा । कई विपक्षी दल टूटकर मोदी के साथ जा सकते है । लोकसभा चुनावों में अगर गठबंधन न भी करते है तब भी अगर राजग बहुमत से दूर रहता है और कुछ विपक्षी दलों के समर्थन की जरूरत होगी तो ये विपक्षी दल समर्थन कर सकते हैं ।

सदन में उपस्थित रहकर किसी भी उम्मीदवार को वोट न करने वाले 16 सदस्य, जो आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, पीडीपी से थे, ने सदन के वॉक आउट कर साफ संकेत दे दिया है कि वे विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस के साथ नहीं है । उपसभापति चुनाव के नतीजे के बाद एक बात तो साफ है कि कांग्रेस अभी भी विपक्षी दलों में भरोसा नहीं बना पाई है । अगर 2019 में मोदी से मुकाबला करना है तो कांग्रेस को अपना कुनबा बढ़ाना ही होगा वरना जीत के आसार खत्म होते जा रहे है ।

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