लोकतंत्र की सामूहिक हत्या, AAP के विधायक अयोग्य घोषित, अन्य के योग्य

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लोकतंत्र की एक और बड़ी संस्था चुनाव आयोग के अंदर से लोकतंत्र के चीखने की आवाज़ सामने आ रही है

चार जस्टिस ने जो ‘आत्मा की आवाज़’ देश के सामने रखी थी, उसके अभी हफ्ते भर ही बीते हैं कि लोकतंत्र की एक और बड़ी संस्था चुनाव आयोग के अंदर से लोकतंत्र के चीखने की आवाज़ सामने आ रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त के हाथों रिटायरमेंट से पहले 20 विधायकों का ‘सामूहिक जन (प्रतिनिधि) संहार’ हुआ है। इन घटनाओं के बाद जनता के मन-मंदिर में लोकतंत्र के प्रति आस्था कांप गयी है। जस्टिस कितना सच बोल रहे थे- ख़तरे में है लोकतंत्र, ख़तरे में है देश।

सवालों में CEC, रिटायरमेंट प्लान बता रही है AAP
सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त एके ज्योति रिटायर हो रहे हैं और शुक्रवार को इतना बड़ा फैसला! दिल क्यों नहीं कांपा। आत्मा क्यों नहीं कांपी। कहां रह गयी नैतिकता। राजनीति की भाषा ऐसे मौकों के लिए बहुत ही बुरी होती है। तभी तो आम आदमी पार्टी के नेता इसे CEC का ‘रिटायरमेंट प्लान’ बता रहे हैं। पीएम मोदी के प्रति निष्ठा दिखाने का एक मौका बता रहे हैं जिनके साथ गुजरात में वे काम कर चुके हैं। बात सही और गलत की नहीं है। बात ये नहीं है कि 20 विधायकों के ख़िलाफ़ ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला सत्य है या असत्य। बात है विश्वसनीयता की। रिटायरमेंट से ठीक पहले इस फैसले पर उंगली उठेगी ही।
चीखता हुआ महसूस हो रहा है लोकतंत्र
न्याय करने का अधिकार ईश्वर हर एक इंसान को दे रखा है। इसी कसौटी पर कोई पड़ोसी भी भला आदमी या बुरा आदमी कहलाता है। नियम-कानून, संविधान का आसरा तो तब लिया जाता है जब आम इंसानों के बीच यह न्याय दम तोड़ता दिखता है या फिर अन्याय सर चढ़कर बोलता दिखता है। निश्चित रूप से ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में आए 20 आम आदमी पार्टी के विधायकों की एक व्यक्ति के रूप में न्याय करने की नैसर्गिक आदत ने दम तोड़ा था और एक मुख्यमंत्री के रूप में अरविन्द केजरीवाल ने इस अन्याय को होने दिया, तभी मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा। मगर, चुनाव आयुक्त के तौर पर एके ज्योति ने जो न्याय सामने रखा है, वह आत्मा की आवाज़ का गला घोंटता हुआ दिख रहा है। लोकतंत्र चीखता हुआ महसूस हो रहा है।
पहले ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का दायरा तो तय हो
ऑफिस ऑफ प्रॉफिट को परिभाषित करना अभी तक सम्भव नहीं हो पाया है। एक जनप्रतिनिधि किसी दूसरे पद पर भी है और वह लाभ का पद है, तभी वह कानून की नज़र में गुनहगार है। नकद सैलरी का लाभ या सुविधाएं या फिर दोनों इस दायरे में आते हैं, इस पर बहस है। इस बहस में उन 20 विधायकों का पक्ष भी सुना जाना चाहिए था। चुनाव आयोग ने उन्हें मौका दिया, मगर उन विधायकों ने इस मौके को जानबूझकर गंवाया। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसके लिए इन विधायकों को बहुत सही फटकार लगायी है। मगर, इनकी बात सुनने से मना नहीं किया है। आम विधायकों ने चुनाव आयोग को सहयोग नहीं किया, इसलिए चुनाव आयुक्त कोई न कोई फैसला करके ही रिटायर हों, यह कैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। बाद के मुख्य चुनाव आयुक्त भी इस मामले पर फैसला ले सकते थे।
जनप्रतिनिधि की अहमियत चुनाव आयोग से बेहतर कोई नहीं जानता
चुनाव आयोग से ज्यादा इस बात की अहमियत कौन समझ सकता है कि एक जनप्रतिनिधि चुनने में जनता को कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। हजारों-लाखों मतदाता पूरी तरह मंथन करने के बाद सभी उम्मीदवारों में एक योग्य उम्मीदवार को चुनता है। इसलिए एक जनप्रतिनिधि में मतदाताओं की सहमति की आत्माएं होती हैं। इन आत्माओं का कत्ल करने से पहले चुनाव आयोग को हड़बड़ी कतई नहीं दिखानी चाहिए थी। वह भी एक जनप्रतिनिधि नहीं, पूरे 20 जनप्रतिनिधि।
20 सीटों पर उपचुनाव नहीं ‘लघु चुनाव’ होंगे
चुनाव आयोग जानता है कि किसी विधानसभा की करीब एक तिहाई सीटों पर उपचुनाव नहीं हुआ करते। इसे उपचुनाव नहीं, लघु चुनाव कहेंगे। लेकिन, लघु चुनाव का कोई प्रावधान है नहीं। नया संकट खड़ा होगा जब उपचुनाव की घोषणा होगी। उपचुनाव की परिभाषा पर विचार किया जाएगा। यह संकट तो अधूरा छोड़कर रिटायर हो रहे हैं मुख्य चुनाव आयुक्त। इसलिए उन्होंने रिटायरमेंट से पहले मामले को सुलझाया कहां। उन्होंने तो मामले को उलझा दिया।
घोर अनैतिकता के युग में नैतिकता का बोझ
जिस सरकार की 66 में से 20 विधायक अयोग्य हो जाएं, उस सरकार पर नैतिकता का बोझ भी आ गिरेगा। विरोधी दलों ने नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री केजरीवाल से इस्तीफे की मांग भी रख दी है। मगर, नैतिकता का सवाल तो खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल उठा रहे हैं। हाल ये है कि अब संकट में है दिल्ली की विधानसभा। संकट में है आप सरकार। संकट में आम आदमी पार्टी है। संकट में हैं मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल। चुनाव आयोग जैसी संस्था इस किस्म की अराजकता पैदा करने के लिए नहीं होती या नहीं होनी चाहिए।
सारी उम्मीद अब नैतिकता से
जब नैतिकता टूटने लगती है, तो इसकी बात सबसे ज्यादा होती है। बहुत कुछ उसी तरह जब पाप बढ़ने लगता है तो मंदिर जाने वालों की तादाद बढ़ जाया करती है। कांग्रेस और बीजेपी कह रही है कि अगर नैतिकता है तो अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दें। आम आदमी पार्टी कह रही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने नैतिकता नहीं दिखलायी है। वहीं, दिल्ली हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने पहुंचे 6 आप के विधायकों को अदालत ने यह करते हुए फटकार लगायी है कि आयोग के बुलाने पर वे चुनाव आयोग के पास क्यों नहीं गये? और, अब किस मुंह से अदालत आए हैं? यानी अदालत ने आप विधायकों की नैतिकता पर सवाल उठाया है। सारी उम्मीद नैतिकता से है।
अदालत से राय लेने की प्रक्रिया शुरू हो
ऑफिस ऑफ प्रॉफिट से जुड़ा 20 विधायकों की अयोग्यता का मुद्दा आखिरकार अदालत में ही तय होगा। इसलिए अच्छा ये होता कि ऐसे मामलों में चुनाव आयोग जैसी संस्था अदालत की राय ले लिया करे या ऐसा करने का प्रचलन शुरू करें। इससे वक्त भी बचेगा, विश्वसनीयता भी। अनावश्यक राजनीतिक अस्थिरता की ओर धकेल देने की स्थिति भी पैदा नहीं होगी। फिलहाल चुनाव आयुक्त ने रिटायरमेंट से पहले जो फैसला लिया है उसकी नैतिकता सवालों के घेरे में है।
By Senior Freelancer Reporter Kumar Premjee
Journalist, Professor, Columnist, Liberal, Humanitarian, Lover of Pro- people Journalism, Democratic in thought

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