15 साल बाद एनडीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, तब पीएम अटल बिहारी वाजपेयी थे और अब नरेंद्र मोदी

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नई दिल्ली. विपक्ष ने बुधवार से शुरू हुए संसद के मॉनसून सत्र के पहले ही दिन सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया, जिसे लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने मंजूर भी कर लिया, जिस पर लोकसभा में अब शुक्रवार को बहस होगी। इससे पहले 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव के 15 साल बाद यह पहला मौका है जब केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को मंजूर किया गया है।

इससे पहले भी आ चूका है अविश्वास प्रस्ताव…

बता दे कि केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ आज कोई पहली बार नहीं बल्कि इससे 1999 और 2003 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तब भी सत्ता पक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था। वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए दो बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया था। 1999 में वाजपेयी के नेतृत्व की एनडीए सरकार मात्र एक वोट की कमी से अल्पमत में आने से गिर गई थी, लेकिन 2003 में वो एनडीए सरकार को बचाने में कामयाब रहे थे और उसके बाद 2004 से 2014 तक केंद्र में यूपीए की सरकार रही, जिसमें मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे और उनको अविश्वास प्रस्ताव का सामना कभी नहीं करना पड़ा।

देश में पहली बार 1963 में पेश हुआ था अविश्वास प्रस्ताव…

पहली बार अगस्‍त 1963 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाया गया था, सदन में अविश्‍वास प्रस्‍ताव पेश करने वाले नेता थे जेबी कृपलानी जो उनके पक्ष में केवल 62 वोट ही पड़ने से लोकसभा में पास नहीं हो सका था। जबकि विरोध में मतलब सरकार के समर्थन में 347 वोट पड़े थे। 1978 में मोरारजी देसाई की सरकार अविश्‍वास प्रस्‍ताव के कारण गिर गई थी।

अब तक इतिहास में अविश्‍वास प्रस्‍ताव के आंकड़े…

भारतीय संसद के अब तक इतिहास में अविश्‍वास प्रस्‍ताव सबसे ज्‍यादा 15 बार इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्‍त्री की सरकार के समय 3 बार, नरसिम्‍हा राव सरकार के समय 3 बार, वाजपेयी के खिलाफ 2 बार अविश्वास प्रस्ताव पेश हुए। नरेंद्र मोदी सरकार के 4 साल के कार्यकाल में यह पहला अविश्‍वास प्रस्‍ताव है और तय हार के बावजूद विपक्ष लेकर आया मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, बीते 4 साल से केंद्र में एनडीए की सरकार है।

कब, क्यों और क्या है अविश्वास प्रस्ताव…

बता दे कि अविश्वास प्रस्ताव मौजूदा सत्ता पक्ष के खिलाफ विपक्षी दलों की तरफ से रखा जाता है, जो केवल लोकसभा में ही रखा जा सकता है, राज्यसभा में नहीं। जब मुख्‍य विपक्षी दलों को लगता है कि सत्ता के पास अब बहुमत नहीं रहा है, तब वे इस प्रस्‍ताव को लोकसभा में रखा जाता है। अविश्‍वास प्रस्‍ताव को पेश करने के लिए कम से कम 50 लोकसभा सदस्‍यों के समर्थन की जरूरत होती है। इसके बाद अविश्‍वास प्रस्‍ताव ही लोकसभा अध्‍यक्ष के सामने पेश किया जाता है।

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स्‍पीकर की मंजूरी के 10 दिनों के अंदर अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर चर्चा होती है। स्‍पीकर अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर वोटिंग कर सकते है। सरकार को बने रहने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का गिरना यानी नामंजूर होना जरूरी है। अगर अविश्वास प्रस्ताव को सदन ने मंजूर कर लिया गया तो समझो सरकार गिर गई। अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित नियम 198 के तहत व्यवस्था है कि कोई भी सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है। यहां समझने की जरूरत है अविश्‍वास प्रस्‍ताव सदन में विपक्ष की ओर से लाया जाता है, जबकि विश्‍वास प्रस्‍ताव सत्‍ता पक्ष की ओर से।

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