सियासत के अंतिम पड़ाव पर चौधरी को देनी होगी कठिन परीक्षा

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सीकर(बाल मुकुंद जोशी)- जिला कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेता चौधरी नारायण सिंह को सियासत के अंतिम पड़ाव में अपनी विरासत को बनाये रखने के लिए कठिन परीक्षा देनी होगी। उनको बाहर की बजाय अंदर की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। आधी सदी तक राजनीति की चौपड़ पर मन माफिक फासा फेंककर पार्टी में अपने विरोधियों को धत्ता बताने वाले चौधरी के लिए अब नेतागिरी की गणित गड़बड़ाने लगी है। जिसका मूल कारण अपनी विरासत सुपुत्र पूर्व प्रधान वीरेन्द्र सिंह को दे या फिर पुत्र वधू पूर्व जिला प्रमुख डाँ.रीटा चौधरी को।

सियासत के अंतिम पड़ाव पर चौधरी नारायण सिंह को देनी होगी कठिन परीक्षा

पुत्र और पुत्र वधु के बीच जद्दोजहद में फंसी विरासत को बरकरार रखने के लिए खाटी जाट राजनीति करने वाले दिग्गज चौधरी नारायण सिंह के लिए निर्णय लेना बढ़ा ही कठिन है। उनके निजी सलाहकार तो उम्र का ख्याल छोड़कर चौधरी साहब को आखरी चुनाव लड़ने की सलाह दे रहे है। जबकि सच्चाई यह कि उनकी सेहत चुनाव लड़ने को बिल्कुल अनुमति नहीं दे रही है।

लम्बे समय तक जिला प्रमुख रहने का रिकॉर्ड…

‎सीकर जिले की दांतारामगढ विधानसभा सीट से सन् 1971 से नारायण सिंह ने आज तक निरन्तर चुनाव लड़ा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, पूर्व मंत्री सहित सीकर के सबसे लम्बे समय तक जिला प्रमुख रहने का रिकॉर्ड भी इनके नाम ही रहा है। जिला कांग्रेस के अध्यक्ष रहते हुए इन्होंने विरोधियों को पानी पिला दिया पर अब बूढे चौधरी के लिये शिद्दत से फैसले लेना आसान नहीं रहा है। राजनीति की बिसात पर उनको खुली चुनौती देना आज भी किसी नेता के बस की बात नहीं है। क्योंकि वे सीकर कांग्रेस के “ठाकरे” जो है। हां नेपथ्य के पीछे जरुर चौधरी साहब की घरेलू राजनीति में रुचि हर कोई ले रहा है।
‎दरअसल नारायण सिंह की दबंग राजनीति के आगे दांतारामगढ विधानसभा क्षेत्र में उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं बन सका। पहले तो किसी ने विधायक बनने की जहमत नहीं की और जिसने कोशिश की उसे मुंह की खानी पडी। ऐसे में इस इलाके से कई कांग्रेसियों के एमएलए बनने के ख्वाब काफूर हो गये।
हालांकि सन् 2013 का चुनाव श्री सिंह मात्र सैकडों मतों से जीते। गोया कि कैसे जैसे उनकी साख बच गई. अब जबकि वे अपने उत्तराधिकारी के रुप में लाडले वीरेन्द्र को चुनाव लडाने की मंशा रखते है। मगर अब घर में ही दूसरे उत्तराधिकारी पुत्रवधु ने ताल ठोक रखी है। चुनाचें सिंह पशोपेश में उलझकर रह गये है। अब देखना यह कि सदा विरोधियों को मात देने वाले चौधरी साहब घर की नेतागिरी को कोमसी दबंगाई से निपटाते है।
‎बहरहाल चौधरी कार्यकर्ताओं के मन को टटोलने के लिए दांतारामगढ में शनिवार को कार्यकर्ताओं का सम्मेलन कर रहे है, देखना यह कि ऊंट किस करवट बैठता है?

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