राजस्थान में भी लागू कर सकती है कांग्रेस “मध्यप्रदेश माॅङल”

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जयपुर। राजस्थान प्रदेशभर में इसी साल के अंत तक में होने जा रहे चार राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस ने तैयारियों के घोडे दौड़ाने शुरु कर दिये है। इसी क्रम में आज मध्यप्रदेश के संगठन को पूरा नेतृत्व दे दिया गया है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ और राजनितिक अनुभवी नेता कमलनाथ को प्रदेशाध्यक्ष का जिम्मा और ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाने के अलावा चार कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर सभी वर्गों को संतुष्ट किया गया है।

दरअसल किसी भी सूरत में कांग्रेस पार्टी प्रदेश में सत्ता के वनवास को समाप्त करना चाहती है। और जाहिर सी बात यह है कि सभी नेता मिलकर चुनाव उतरेंगे तो बीजेपी को नाकों चने चबा देगे।

कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी के लिए भी इन चारों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीशगढ और मिजोरम में करो या मरो की स्थिति है। जहां भाजपा सत्ता को बचाने की जुगत में रहेगी तो कांग्रेस किसी भी हाल में इन राज्यों में सत्ता में लौटने के लिए बिगुल बजा चुकी है। ऐसे में मध्यप्रदेश में जाजम बिछाने के बाद कांग्रेस का अगला कदम राजस्थान की ओर होगा। यहां भी “मध्यप्रदेश माॅडल” को लागू किया जा सकता है। मतलब प्रदेश कांग्रेस को चुनावी वैतरणी पार करने के वास्ते अगले कुछ दिनों में दो से चार कार्यकारी अध्यक्ष मिल सकते है।
दरअसल जातीय समीकरण का संतुलन बैठाने के लिए पार्टी आलाकमान को इस दिशा में गंभीरता से सोचना पङेगा। वैसे भी कांग्रेस पार्टी ने मध्यप्रदेश में यह प्रयोग कर लिया गया है तो राजस्थान में क्यों नहीं किया जा सकता।

राजस्थान में सत्ता के आने की आहट से कांग्रेसजन अंदर ही अंदर खुश तो जरुर है, परन्तु अभी सूबे में जातीय गणित का फार्मला बैठाना नितांत आवश्यक है। अन्यथा परिणामों में हेरफेर होने में भी वक्त लगने में ज्यादा देर नहीं होगी। चुनाचें कांग्रेस को जाट, राजपूत, ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक को साधने के लिए फार्मूला इजाद करना होगा। हाल ही में जनजाति ने कांग्रेस को रंग दिखा दिया है। इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस में जाट, दलित, ब्राह्मण और अल्पसंख्यक हाशिए पर है, जबकि इन जाति के मतदाताओं का रुख बीजेपी के प्रति का कठोर है।

ऐसे में चुनावी दंगल में कूदने से पहले कांग्रेस को इन जातियों के अनुभवी पहलवानों को उतराना पडेगा। केवल युवा-युवा का नारा देकर सत्ता की चौखट पर नहीं चढ पायेगी। वैसे भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नये नेतृत्व का निर्णय इस बात का साफ संकेत देता है कि सभी को साथ लेकर सत्ता की बाजी जीती जा सकती है।

कांग्रेस हाइकमान को राजस्थान के संगठनात्मक मामलों के फैसले अब जल्द ही लेने होंगे, क्योंकि विधानसभा के चुनाव अब नजदीक है, जबकि इस राज्य के चार सौ ब्लाक अध्यक्षों के नामों की घोषणा भी अभी तक नहीं हुई है। इसके अलावा करीब 19 जिलाध्यक्षों को भी बदले जाने है। सूत्र बताते है कि कांग्रेस पार्टी में लिये गये उस निर्णय में अपवाद स्वरुप ढील दी जा सकती है, जिसमे कहा गया था कि चुनाव लडने वाले को संगठन का अध्यक्ष नहीं बनाया जायेगा।

बहरहाल दिल्ली में 29 अप्रैल की पार्टी की रैली के बाद राजस्थान में भी कांग्रेस पूरे साज-बाज के साथ चुनावी रणभेरी बजायेगी और कई महायोद्धा को तरह-तरह की नई-नई जिम्मेदारी के साथ सत्ता को पाने के लिए भाजपा को ललकारते नजर आ सकते है। यानी पीसीसी में अनेक दिग्गज प्रभावी मुद्रा में देखने को मिल सकते है? सियासी पंडितों की माने तो “मध्यप्रदेश माॅडल” की झांकी राजस्थान में झलक सकती है।

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