16 दिसंबर की काली रात में वह लड़की दामिनी बन गई!

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Damini

दिल्ली – एक बेटी जो फिल्म देखने के बाद उसका रिव्यू दिमाग में दोहराते हुए उसके मजे ले रही है और उसे कहा पता था कि वो आज सूली पर चढ़ने वाली है। जी हां ये आज से पांच साल पहले की बात 16 दिसम्बर 2012 की… ठंड की रात थी, चारों तरफ की सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। फिल्म देखने के बाद वो लड़की एक युवक के साथ मुनरिका से द्वारका जा रही थी। वो खुश थी, फिल्म में देखे गए दृश्य को युवक मित्र के साथ साझा कर मन को बहला रही थी लेकिन, कहा उसे पता था कि उसकी खुशी चंद मिनटों में दर्दनाक मौत में तब्दील होने वाली है। उसी दौरान बसस्टाप पर बस रूकती हैं और एक नाबालिक लड़का दीदी कहा जाना हैं कह कर पूछता है।

लड़की और उसका दोस्त बस में सवार हो जाते हैं। बस में सवार छहों लोग उसके साथ छेड़छाड़ करना शुरू कर देते हैं। लड़की के साथ मौजूद युवक को बुरी तरह से पीटा, अब वो युवक सन्न पड़ा हुआ था। बस में मौजूद उन 6 व्यक्तियों ने लड़की के साथ बारी-बारी से रेप किया, उसकी जिन्दगीं को चंद लमहों में उजाड़ दिया, उसके डॉक्टर बनने के सपनों को जिंदा गाड़ दिया। उजाड़ दिया देश की उस इज्जत को जिसने कभी उसे जन्म दिया था।

चंद मिनटों मे वो लड़की दामिनी हो गई… दामिनी का रेप कर उसे बस से सूनसान सड़क पर फेक दिया गया। हैवानियत का दृश्य तो यहा भी जारी रहा वहां से लोग निकलते रहे मगर किसी ने भी दामिनी के नग्न शरीर को ढ़कने के लिए वस्त्र नहीं दिए, दामिनी को देख मुंह फेर लेते… दामिनी तड़पती – सिहरती रही कि कोई तो आएगा जो उसकी पीड़ा को समाप्त कर देगा, मगर किसी ने भी मदद नहीं की। घंटों बीत गए तब वहां से गुजर रहे एक इंसान ने पुलिस को कॉल कर जानकारी दी। घंटों बात पुलिस की 3 गाड़िया तो दामिनी को लाचार देखने पहुंच गई लेकिन उन्होंने दामिनी को अस्पताल ले जाने में काफी वक्त लगा दिया। दामिनी सड़क पर नग्न अवस्था में चीखती रही मगर उस बेरहम शाम को भी शर्म नहीं आई की वो दामिनी की मदद कर दे।

पुलिस वाले ने दामिनी के शरीर को चादर से ढ़का, मगर उसके घाव मानो उसे मार रहे हो। हैवानियत का यह मायाजाल खत्म होने के लिए सफदरजंग अस्पताल में जा पहुंचा, दामिनी सफदरजंग अस्पताल के आईसीयू में तड़प रही थी। सोशल मीडिया के जरिए दामिनी की चीखे लोगों तक पहुंचने लगी थी, देश का एक बहुत बड़ा जत्था दामिनी के इंसाफ के लिए हांथो में मोमबत्ती लिए सड़कों पर निकल आया था, मगर असल में दामिनी उस वक्त सोच क्या रही होगी? यह सवाल सफदरजंग अस्पताल में कही खो सा गया हैं, क्योंकि देश की जनता का खून ठंडा जो हो गया हैं।

चारो तरफ आवाजे उठने लगी दामिनी के इंसाफ की, लड़कियों के हक की, महिला सुरक्षा कानून की चर्चाएं होने लगी। देश उबल रहा था, राजनैतिक गलियारे सुन्न पड़े थे। शीला दीक्षित हमे इंसाफ चाहिए के नारे दिल्ली सीएम आवास के बाहर लग रहे थे। देश की गलियो में मानों आक्रोश पैदा हो गया हो, सोया हुआ इंसान इस घटना के बाद जाग गया, हक की बाते करने लगा, इंसाफ मांगने लगा मगर दामिनी के हालात बद्दतर होते रहे, वो मौत के करीब जाने लगी, वो अपनी सांसो से लड़ती रही वेरहम दुनिया को छोड़ने के लिए। इसी बीच दामिनी को चंद मिनटो के लिए होश आया और उसने अपनी मां से केवल यही सवाल किया कि क्या उन लोगों को फांसी की सजा मिली या नहीं? यह सवाल आज भी दामिनी के मन में चल ही रहा होगा भले ही वो किसी भी दुनिया में क्यों न हो?

जंतर मंतर पर प्रदर्शन

जंतर-मंतर, इंडिया गेट में लोग इकट्ठा होने लगे पुलिस के साथ इन लोगों की झड़प हुई, कुछ दिनों के भीतर सारे आरोपी पकड़े गए। वहीं 23 दिसम्बर के दिन पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारियों में बुरी तरह झड़प हो गई, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया, देश के प्रधानमंत्री लोगों से शान्ति व्यवस्था कायम रखने की अपील करते रहे और आरोपियों को सजा मिलने का आश्वासन देते रहे। इसी बीच दामिनी जिन्दगी की जंग  हारने लगी, दामिनी को इलाज के लिए सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया। इलाज चल ही रहा था कि दामिनी ने अपनी सांसे थाम ली और इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया।

अब दामिनी नहीं थी हमारे बीच अब बस बची थी तो उसकी वो चीखे और दर्द जो खाली सड़क देख कर लोगों के ज़हन में उभर आती हैं और सवाल करती हैं कि क्या दामिनी को इंसाफ मिला? दामिनी के इस हादसे के बाद भी लोकतंत्र में कुछ नहीं बदला जो लोग जाग गए थे, हक की बाते करने लगे थे। वो वापस सो गए, लोग तमाशा देखने लगे।

आंकड़ों की जुबानी

आलम यह हैं कि राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के 2013 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक 24923 मामले दर्ज हुए हैं। जबकि इनके अलावा ऐसे भी मामले हैं जो दर्ज ही नहीं होते हैं। तो फिर दामिनी की मौत के बाद क्या बदला? हमने एक बेटी को खो दिया मगर हमारा जेहन आज भी सो रहा हैं, कहीं पर कोई कथित घटना घटती हैं तो हम मुंह फेर कर निकल जाते हैं। आखिर हमारे देश के लोगों को जागने के लिए हर बार किसी घटना के घटित होने की जरूरत क्यों पड़ती हैं? 16 दिसम्बर बहुत से लोग तो इस तारीख को भी भूल ही गए होंगे बीते हुए साल की तरह, बदला पहले भी कुछ नहीं था और आज भी कुछ नहीं बदला।

16 दिसंबर की इस दर्दनाक दास्तां पर चंद पंक्तियां:

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