विपरित परिस्थितयो में वार्ड पार्षद से अपनी राजनैतिक जीवन की इन्होंने शुरूवात की दिनेश जोशी ने शहर वाले विकास पुरूष कहते हैं दिनेश को

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जोशी प्रथम बार *चैयरमैन बनते ही विकास की गंगा ऐसी बहाई नुक्कड़ गल्ली से लेकर शहर के मुख्य मार्गो तक सड़को का जाल बिछा दिया नगर भामाशाहो के सहयोग से नगर में विकास की क्रांतिदूत बनकर उभरे तत्पश्चात शहरवासीओ ने *जोशी को विकाश पुरुष* का तमगा दिया।
जोशी ने अपनी पहचान इसी कार्यकाल से बनाई इसके बाद इन्होंने अपना रुख ग्रामीण अंचल की ओर किया ।
जिले के पूर्व दिग्गज काँग्रेसी नेता स्व.सांवरमल मोर को गनेड़ी पंचायत से रिकॉर्ड तोड़ मतो से पराजित कर लच्छमंगढ़ के प्रधान प्रत्यासी भाजपा के बैनर से बने। पार्टी की गुटबाज़ी के चलते जोशी 4 मतो से पराजित हुए। इस हार से जोशी का इरादा ओर मज़बूत हुआ इन्होंने गांव गांव ढाणी ढाणी में में अपनी पकड़ बनाई और 2008 में विधानसभा चुनाव में दोनो पार्टियो की पॉलिसी को नकारते हुए निर्दलीय प्रत्यासी के रूप में ताल ठोक दी अपने प्रतिद्वंदी गोविंद डोटासरा को कड़ी टक्कर देते हुए मात्र 34 मतो पराजित हुए। इस हार को इन्होंने जीत मान कर क्षेत्र की जनता के बीच दुगुनी मेहनत और लगन के साथ मैदान में डटे रहै, तत्पश्चात 2010 में नगर चुनाव में फिर से निर्दलीय प्रत्यासी के तौर पर नगर की जनता ने इनको तजपोसी देकर नगर का दूसरी बार चैयरमैन बनाया। इन्होंने नगरपालिका को बिना किसी पार्टियो के सहारे विकास की राह पे चलाई ओर इस कार्यकाल में इनके जीवन का सबसे बड़ा सपना सहर को अंधाधुंध ट्रेफिक से निजात दिला कर भामाशाह के सहयोग से बड़े बस स्टैंड का निर्माण करवाया।
10 साल के कार्यकाल में 1 रुपये का भी गबन का आरोप नही लगा पाए जबकि दोनो सरकारों के विपक्ष में नगरपालिका चलाई।
फिर 2013 में विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्यासी के रूप में क्षेत्र की जनता के प्यार और साथ को लेकर ताल ठोकी मोदी लहर ओर केंद्र के बड़े नेता मैदान में होने के बावजूद इनका मत प्रतिशत दोगुनी रफ्तार से बढ़ा और 45 हज़ार वोट लेकर मज़बूत प्रत्यासी के तौर पर उभरे हालांकि चुनाव में पराजय
रहे पर इनके हौसले की दात देनी होगी इन्होंने अपना जनसम्पर्क जनता से उसी रफ्तार से बनाये रखा ।
जोशी सुबह 8 बजे घर से निकलकर लक्ष्मंनगढ़ विधानसभा की हर गांव ढाणी के सुख दुख में शामिल होते है इनके विरोधी भी दबी जुबा से इनकी मेहनत की प्रसंशा करना नही भूलते
गांव और शहर के विकाश मंच के हज़ारों कार्यकर्ता हर पल इनसे सीधे संपर्क में रहते है यही इनकी क्षेत्र में सबसे बड़ी पकड़ है
*ना संघर्ष न तकलीफ*
*तो क्या मज़ा है जीने में*,
*बड़े-बड़े तूफ़ान थम जाते हैं*,
*जब आग लगी हो सीने में*

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