अब भारत जल्द देखेगा ज़ीरो की खोज का सबूत!

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शून्य की खोज !!

बचपन में कहानियों से लेकर बॉलीवुड की फिल्मों और गानों तक आपके जीरो यानी शून्य की खोज का बहुत जिक्र सुना होगा कई बार ऐसे मौके भी आए होंगे, जब आप आर्यभट्ट के महिमा मंडन और प्राचीन भारत की समृद्ध विरासत के किस्सों से रुबरु हुए होंगे। लेकिन शून्य भारत की खोज है, इसका क्या सुबूत है?
जीरो गणित की दुनिया में आज तक की सबसे बडी खोज है, हालांकि आमतौर पर हम जब हम किसी शख्स को कहते हैं कि वो जीरो है तो उसके मायने होते हैं कि उसे कुछ नहीं आता जाता या कहे कि वो जिंदगी के हर पहलू में असफल हैं, लेकिन जीरो का महत्व इसी से पता चलता है कि अंतरिक्ष में यान भेजने तक कुछ भी जीरो के बिना संभव नहीं हो पाता। माना जाता है कि जीरो यानी शून्य की खोज ब्रह्मगुप्त ने की थी लेकिन हालियां रिसर्च में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि जीरो की खोज ब्रह्मगुप्त से लगभग 500 साल पहले ही हो चुकी थी।
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शून्य की खोज का क्या है सुबूत?
ऐसे सवाल आपके ज़ेहन में भी आता है तो तैयार हो जाइए उस सुबूत को अपनी आंखों से देखने के लिए सभी दौर की बातचीत और शर्तों पर रजामंदी हो जाती है तो जल्द ही ब्रिटेन की लाइब्रेरी से बख्शाली हस्तलिपि सार्वजनिक प्रदर्शनी के लिए भारत आएगी। सरकार के बड़े विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार ने लंदन की बोडेलियन लाइब्रेरी से गुज़ारिश की है कि वो बख्शाली हस्तलिपि को प्रदर्शनी के लिए अस्थाई रूप से भारत भेजें। जानिए शून्य से जुड़ी ये सैकड़ों साल पुरानी बख्शाली हस्तलिपी आखिर है क्या और क्या है इसका महत्व?
आर्यभट्ट से भी पुरानी है बख्शाली हस्तलिपि….

शून्य की खोज

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शून्य की खोज !!

पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अखबार डॉन के मुताबिक वैज्ञानिकों को बक्खशाली लिपि में लिखे एक भोजपत्र पर कुछ डॉट्स मिले हैं। इस भोजपत्र पर गणितीय गणनाएं की गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये डॉट्स ज़ीरो हैं। ये भोजपत्र वैज्ञानिकों को पाकिस्तान के पेशावर में स्थित एक गांव बक्खशाली में 1881 ईसवीं में मिला था। बाद में इसे वहां से लाकर 1902 में ऑक्सफोर्ड के बॉडलेन लाइब्रेरी में रखा गया। कार्बन डेटिंग से पता लगा कि यह ईसा से 300 सदी पुराना भोजपत्र है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये दुनिया का सबसे पहला ज़ीरो है। इस पूरे भोजपत्र पर लगभग इस तरह के लगभग सौ डॉट्स हैं।
भारत में ज़ीरो के प्रमाण ग्वालियर के एक मंदिर की दीवारों पर मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि ज़ीरो का प्रयोग सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप में ही किया जाता रहा है। माया व बेबीलोनिया सभ्यता के लोग भी इससे पहले ज़ीरो का प्रयोग करते रहे हैं लेकिन भारत ज़ीरो के लिए जिस डॉट का प्रयोग करता रहा है वही ज़ीरो बदलकर आज का ज़ीरो हो गया है।
पुरातत्व विशेषज्ञों के मुताबिक इस हस्तलिपि की रचना 300 से 800 ई. में हुई थी। जो आर्यभट्ट के जन्म से भी पहले की बात है। इसको साल 1902 में ब्रिटेन की ऑक्सफर्ड में बोडलियन लाइब्रेरी में संग्रहित किया गया।

संस्कृत और गणित में लिखे हैं भोजपत्र
70 भोजपत्रों पर मौजद इस हस्तलिपि को संस्कृत और गणित भाषा में लिखा गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्रिटेन ने कार्बन डेटिंग के जरिए पता लगाया है कि ये हस्तलिपि जितनी पुरानी कही जा रही है, उससे भी ज्यादा प्राचीन है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के मुताबिक इसको बौद्ध भिक्षुओं के लिए तैयार किया गया हो सकता है। इसमें सैकड़ों जगह शून्य लिखा हुआ है। प्रोफेसर ने बताया कि इतने भोजपत्र एक साथ नहीं लिखे गए होंगे। अलग-अलग दौर में इन्हें लिखा गया, जो अंतर साफ दिखाई देता है।

क्या वाकई आर्यभट्ट ने थी जीरो की खोज…
अभी तक जीरो की खोज के जनक आर्यभट्ट को माना जाता है। उनका जन्म 476 ईसवीं में हुआ था। अगर बख्शाली की कार्बन डेटिंग से समझा जाए तो आर्यभट्ट से पहले भी भारतीयों को जीरो की समझ थी। ऐसा कहा जाता है कि आर्यभट्ट ने जीरो का इस्तेमाल सीधे तौर पर नहीं किया था। उन्होंने अंकों की जगह अक्षर लिखे और हर अक्षर का मान तय किया। इस तरह शब्दों में संख्या लिखी।

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