माननीय प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र – राजपाल फोगावत

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माननीय प्रधानसेवक जी,

सादर प्रणाम !!

मेरा नाम राजपाल फोगावत है|भारत का नागरिक होने के नाते मेरे मन में कुछ सवाल हैं , जिनके जवाब आपके पास होने की आशा से पूछ रहा हूँ – मुझे उम्मीद है कि मेरा यह पत्र व संदेश आप तक जरूर पहुंचेगा व मुझे जवाब मिल पाएंगे |

आपकी सरकार को बने हुए कुछ ही महीनो में 4 साल होने को जा रहे हैं व आप वर्तमान NDA सरकार के अपने कार्यकाल के आखिरी साल में प्रवेश कर जाएंगे |

2014 में जब चुनाव हुए तो उससे पूर्व की कांग्रेस सरकार, जिसे आजादी के बाद देश में बेहतर तरीके से कार्य करने के अनगिनत मौके मिले , पर एक विफल, नाकारा, व भ्रष्ट सरकार का ठप्पा लग चुका था | माननीय अन्ना हजारे व अरविंद केजरीवाल द्वारा शुरू किए गए जन आंदोलन ने अप्रत्यक्ष रूप से आप की सरकार बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाई | देश को आप से काफी उम्मीदें थी |

राजनीतिक रूप से मेरे विचार दोनों ही कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी से नहीं मिलते थे, व मेरा झुकाव एक नए राजनीतिक संगठन आम आदमी पार्टी की तरफ था |

इन सबके बावजूद आपकी दो बातों में मेरा आंशिक लेकिन मजबूत विश्वास था –

1 . “मेक इन इंडिया” जिसके तहत भारत से बेरोजगारी की समस्या से कुछ राहत मिल सकती थी|
2 . सरकार में आने पर राजनीति में शामिल अपराधिक छवि वाले नेताओं के मामले विशेष अदालत बनाकर 1 साल में निपटारा करने का वादा |  Link

हालांकि चुनाव पास आते-आते, जैसे-जैसे BJP ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा की उससे मेरे मन में संदेह पैदा होता था | फिर भी मुझे लगता कि ,एक बार जब आपके हाथ में पूर्ण सत्ता रहेगी तो आप समस्त भ्रष्ट है आपराधिक छवि वाले नेता पर लगाम लगाएंगे व उन्हें राजनीति से बाहर का रास्ता दिखाएंगे|

राजनीति में भ्रष्ट पर आपराधिक लोगों का बोलबाला –

आप ने सरकार बनाई जो जल्दी 4 साल पूरे करने जा रही है| आपके द्वारा किया गया वादा – आपराधिक वह भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ त्वरित गति से 1 साल के भीतर केस के निपटारे संबंधी दावा पूर्णतया ही गलत साबित हुआ | ना तो आपने स्वयं की भारतीय जनता पार्टी को भ्रष्टाचार व अपराधीकरण से मुक्त करने के कोई उपाय किये और ना ही आश्चर्यचकित तरीके से कांग्रेस (जिसके ज्यादातर सांसद व मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त थे) के खिलाफ कोई कार्यवाही हुई| मुझे लगता है कि अगर सीबीआई को स्वतंत्र किया जाता और व बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के कार्य करती तो निश्चित ही कांग्रेस के बहुत सारे नेता (जिनमें राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी शामिल है) आज जेल में होते हैं| लेकिन आपके वादा अनुसार ना तो सीबीआई को स्वतंत्र करने की दिशा में कोई प्रयास हुआ और ना ही कोई बड़ा कांग्रेसी नेता जेल में गया | वर्तमान में मुझे इस मुद्दे पर आपसे कोई आशा नहीं बची है फिर भी आप से जानना चाहूंगा कि आपने भ्रष्ट व आपराधिक ताकतों को हराने के लिए क्या कदम है क्या कदम उठाए ?

CIC व RTI के बजट में 63 फ़ीसदी कटौती –

2 दिन पूर्व घोषित बजट में आरटीआई व सीआईसी ( जो कि दोनों सिस्टम को पारदर्शी बनाए बनाने के लिए महत्वपूर्ण संगठन है) के बजट में भारी कटौती की गई है जो कि मेरी समझ से बाहर है | अभी हाल ही में Forbes द्वारा जारी सितंबर 2017 में रिपोर्ट के अनुसार भारत को एशिया का सबसे भ्रष्ट राष्ट्र घोषित किया गया है | भ्रष्टाचार के बढ़ने वह घटने में पारदर्शिता का बहुत बड़ा हाथ है| व्यवस्था जितनी पारदर्शक होगी उतना ही भ्रष्टाचार के मामले घटेंगे | हालांकि मुझे इस मामले में भी बहुत निराशा हाथ लगी कि एनडीए सरकार जिसके आप मुखिया हैं – उसने आरटीआई कानून के प्रचार प्रसार मैं कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई व विभिन्न मौकों पर इसे रोकने का भी प्रयास किया गया | अरुण जेटली ने दोनों CIC व RTI दोनों के लिए मात्र 8.66 करोड रुपए ही आवंटित किए हैं| मेरा आपसे सवाल है – आप बताएं कि क्या आपको लगता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पारदर्शिता बढ़ाने वाली एजेंसी के लिए यह पर्याप्त बजट है ? क्या आप आरटीआई के लिए बजट कम कर के भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं?

शिक्षा का बजट –

अभी हाल ही में Careers360 के संस्थापक महेश्वर पेरी ने चेन्नई में आयोजित एक इन्वेस्टर्स के सम्मेलन में अपने श्रोताओं से पूछा (जो कि ज्यादातर पेरेंट्स थे) कि अगर आपको आज 10 लाख रुपए दिए जाएं तो आप निम्न तीन में से किस विकल्प को चुनेंगे –
1 अपने सपनों का घर बनाएंगे
2 अपने घर को और बड़ा करेंगे
3 पूरी पूंजी अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश कर देंगे |

आशा के अनुसार ज्यादातर पेरेंट्स में तीसरे विकल्प को चुना क्योंकि सभी जानते हैं की शिक्षा पर किया गया खर्च , एक खर्च होने के बजाय निवेश ज्यादा है और जो कि कुछ समय बाद Returns भी देता है | लेकिन यही पेरेंट्स जिनमें बहुत सारे सरकारी कर्मचारी ,नीतियां बनाने वाले चिंतक व राजनीतिज्ञ भी थे , जब देश के संदर्भ में यह बात पूछी जाए तो उनकी सोच बदल जाती है |
श्री महेश्वर ने जब पूछा कि ऐसा क्या है कि एक ही व्यक्ति का विचार अपने बच्चों व देश को लेकर अलग-अलग कैसे हो सकता है ? तो जवाब आया कि सरकारें कभी भी हमारे बच्चों को खुद के बच्चे नहीं मानती है|

आपने एक और योजना बनाई जिसे नाम दिया गया स्किल इंडिया | मेक इन इंडिया की सफलता के लिए स्किल इंडिया की सफलता बहुत जरूरी थी | क्योंकि अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था वर्तमान समय की औद्योगिक व्यावसायिक जरूरतों को पूरा नहीं करती है तो उसे हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमी ही मानी जाएगी |

आप नजर दौड़ाएंगे तो पाएंगे कि ज्यादातर विकसित राष्ट्रों में शिक्षा के बजट की बड़ी अहमियत है | भारत के मुकाबले उनका बजट लगभग दुगुना (जीडीपी का 6 से 7%) रहता है| अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत बजट में पहली बार शिक्षा बजट को पिछली बार (GDP का 3.69 %) के मुकाबले कम (3.48 %) रखा गया है| यह हालात तो जब हैं जब देश में सिर्फ 62 प्रतिशत विद्यालयों में ही बिजली के कनेक्शन हैं, सिर्फ 24 प्रतिशत विद्यालयों में ही कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध है | बजट में घोषित विभिन्न शैक्षणिक योजना के लिए बजट का प्रावधान नहीं रखा गया है| यह मुझे बहुत ही चिंतित करता है – खासकर शिक्षा, जो कि अमीरी व गरीबी का फासला मिटाने के लिए सबसे कारगर हथियार साबित हो सकता है, वही हम पिछड़ रहे हैं वह समाज में व्याप्त असमानता को बढ़ाने में भागीदार भी बन रहे हैं|

आपको बता दूं, देश की राजधानी दिल्ली जहां आम आदमी पार्टी की सरकार है उन्होंने भी, 3 वर्षों में शिक्षा बजट को अप्रत्याशित रूप से ( 20% से 25% तक) रखा है जिसके चलते आज दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प हो चुका है| मेरा आपसे सवाल है – क्या आपको लगता है “स्किल इंडिया” व “मेक इन इंडिया” व अन्य सरकारी योजनाएं शिक्षा बजट को कम रखने से हासिल हो सकती हैं?

राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग का मुद्दा –

भारतीय राजनीति व्यवस्था में चुनाव लड़ने हेतु उम्मीदवारों व् राजनीतिक पार्टियों के समक्ष फंडिंग की दिक्कत हमेशा रही है| आजादी के इतने दशकों बाद भी किसी भी दल ने इस चुनाव सुधार की तरफ ध्यान नहीं दिया | जिसके चलते उम्मीदवार या तो स्वयं के पैसे खर्च करने को मजबूर होता है या बड़े उद्योगपतियों से बड़ी मात्रा में चंदा लेता है, जो कि चंदा कम वह स्थान ज्यादा लगता है | चुनाव जीतने के बाद उन्हीं उद्योगपतियों के स्वार्थों की रक्षा करना राजनेता का की मजबूरी बन जाता है|

ADR द्वारा 2017 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत के दोनों मुख्य दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के चंदे का अधिकांश हिस्सा (69%) अज्ञात सूत्रों द्वारा प्राप्त होता है| भारतीय जनता पार्टी वह कांग्रेस दोनों को दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेशी चंदा मामा लेने के मामले में दोषी पाया था| उसके पश्चात अपनी गलती मानने के बजाय माननीय अरुण जेटली द्वारा कानून में संशोधन कर विदेशी चंदे को ही मान्य कर दिया गया| मेरा आपसे सवाल है – क्या यह भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है ?

अभी हाल ही में इलेक्टोरल बांड्स योजना को लाकर भारतीय सरकार ने फिर से बड़े स्तर पर राजनीति में प्रभावशाली कंपनियों व लोगों का दखल बढ़ा दिया है| इलेक्टोरल बांड के जरिए 1000, 10000, 1 लाख, 1000000 वह एक करोड़ के गुणन मैं अपना दान राजनीतिक पार्टी को बिना अपनी पहचान उजागर किए दे सकता है, जिससे बैंक के अलावा किसी भी अन्य संस्था के पास दानदाता की पहचान नहीं जाएगी| मेरा आपसे सवाल है – क्या इलेक्टोरल बांड से कोई भी प्रभावशाली/धनवान व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा पैसे देकर राजनीतिक व्यक्ति/पक्ष को प्रभावित नहीं कर सकेगा ? गणतंत्र में इस तरीके की व्यवस्था दीर्घकाल में बहुत ही घातक साबित नहीं होगी?

पत्र आपको प्रेषित किया जा चुका है |

आपका देशवासी |
राजपाल फोगावत
बेंगलुरु

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