Opinion: कर्नाटक में भाजपा की भावी अनैतिक सरकार

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गोआ और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी किन्तु वहां कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया गया और भाजपा ने जोड़तोड़ कर तथा हॉर्स ट्रेडिंग कर सरकारें बना ली।

कर्नाटक में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी अवश्य है लेकिन स्पष्ट बहुमत से दूर है और बिना खरीद फरोख्त किये बहुमत मिलना सम्भव भी नहीं है।

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कर्नाटक में भाजपा को 104 सीटें तथा सिर्फ 36 प्रतिशत वोट मिला है। जबकि कांग्रेस को 78 सीटें तथा 38 प्रतिशत वोट और जनता दल सेक्युलर को 37 सीट तथा 18 प्रतिशत वोट मिला है। दोनों पार्टी मिलकर सरकार बनाना चाहती हैं। कांग्रेस ने जेडीएस को बिना शर्त समर्थन दे दिया है। उनकी सँयुक्त सीटें 115 तथा वोट 56 प्रतिशत होता है। बहुमत के लिये 112 विधायक होना जरूरी हैं। यानी बहुमत का जादुई आंकड़ा कांग्रेस+जेडीएस के पक्ष में है।

लेकिन कर्नाटक के गवर्नर वजुभाई वाला अपने विवेक का इस्तेमाल कर गोआ और मणिपुर की तरह कांग्रेस+जेडीएस को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित नहीं करेंगे और ‘ऊपर’ के आदेश का पालन करते हुए एक अल्पमत पार्टी के नेता येदियुरप्पा को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करेंगे। ताकि वे विधायकों की खरीद-फरोख्त कर सदन में अपना बहुमत सिद्ध कर सकें।

इसके लिये भाजपा कांग्रेस और जेडीएस के कुछ विधायकों को अन्य मलाईदार पद देने का लालच देकर उनसे इस्तीफे दिलवाएगी ताकि सदन में प्रभावी संख्या कम हो जाये और उसे बहुमत साबित करने का अवसर मिल जाये। बाद में पूंजीपतियों और खनिज माफिया रेड्डी बंधुओं के धन बल तथा प्रशासन के सहयोग से उपचुनावों में जीत हांसिल कर निर्विवाद रूप से सरकार चलाई जा सके।

भाजपा के लिये लोकतन्त्र का यही अर्थ है कि भले ही किसी भी राज्य में बहुमत नहीं मिले, लेकिन किसी भी तरह जोड़तोड़ कर सरकार अवश्य बनाई जाए। इसके लिये गवर्नर जैसे संवैधानिक पद का चाहे जितना दुरुपयोग करना पड़े वह वांछनीय है।

भाजपा लोकतंत्र की दुहाई उसी तरह देती है जिस तरह हिटलर ने लोकतंत्र की दुहाई देकर जर्मनी में अपनी सत्ता स्थापित की थी। एक बार सत्ता में आने के बाद हिटलर ने सारी लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं को तहस-नहस कर दिया था।

भारत आकार और आबादी में जर्मनी से कई गुना बड़ा है। इसलिये यहां एक चालक की सत्ता ( संघ का एकचालकानुवर्तित्व का सिद्धान्त) स्थापित करने के लिये एक-एक कर सभी राज्यों में भाजपा की सरकार बनाना जरूरी है। सरकार कैसे बनती है यह महत्वपूर्ण नहीं है।

साध्य की प्राप्ति के लिये घटिया से घटिया साधन स्तेमाल करने में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को कोई दुविधा नहीं है। इसीलिये कश्मीर और पूर्वोत्तर में अलगाववादियों की समर्थक पार्टियों के साथ सरकार बनाने में भाजपा को कोई परहेज नहीं हुआ। ठीक उसी तरह जिस तरह 1942 में बंगाल में उनके संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान अलगाववादी मुस्लिम लीग की सरकार में उपमुख्यमंत्री बनने में कोई दुविधा नहीं हुई थी।

इसी तरह कर्नाटक में भी संवैधानिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाते हुए और गवर्नर के पद का दुरुपयोग करते हुए 36 प्रतिशत वोट पाने वाली अल्पमतीय पार्टी को सरकार बनाने का अवसर दिया जाएगा। 115 सीट और 56 प्रतिशत वोट पाने वाला गठबन्धन विपक्ष में बैठेगा।

गोआ में सरकार बनाते समय भाजपा के वरिष्ठ नेता और अभी तक वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली ने कहा था कि महत्वपूर्ण यह नहीं है कि सबसे बड़ी पार्टी कौन है। महत्वपूर्ण है गठबन्धन जिसके पास बहुमत है। गोआ में भी चुनावपूर्व भाजपा का कोई गठबन्धन नहीं था। चुनाव के बाद दूसरी पार्टियों के समर्थन से बहुमत जुटाया गया और कांग्रेस के कुछ विधायकों की खरीद-फरोख्त की गई तथा एक अनैतिक सरकार बना ली गयी।

कर्नाटक में जब दो पार्टियों के पास स्पष्ट बहुमत है और दोनों पार्टियों को मिलने वाले वोटों की संख्या भी 56 प्रतिशत है तब उस गठबन्धन को सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया जाना घोर अनैतिकता ही मानी जायेगी। कर्नाटक के गवर्नर जो कि संघ के पुराने वफादार स्वयंसेवक हैं, उनसे संवैधानिक मर्यादाओं के पालन की अपेक्षा करना व्यर्थ ही है।

Written By https://www.facebook.com/praveen.malhotra.9

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