सरकारी खजाना खाली, क्या करेगी भारत सरकार?

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भारत कैसे रहेगा गरीब?

वर्ल्ड इकोनामिक फोरम में कहा गया है कि सामाजिक असमानता और शिक्षा की कमी आर्थिक विकास के लाभ को प्रभावित करती है, आर्थिक विकास के बावजूद, जनसंख्या एक महत्वपूर्ण कारण है जो विकास को रोकती  है।

नोट बंदी का असर सरकारी खजाने और बैंकों में स्पष्ट दिखाई दे रहा है|

इस कारण बैंकिंग सिस्टम सुधारने के लिए सरकार को करोड़ों रुपयो की जरूरत है।हालत यह है कि सरकार के पास इतना पैसा नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 लॉकडाउन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में 9.6 फ़ीसदी की गिरावट होने का अनुमान है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन और अन्य पाबंदियों से वायरस संक्रमण का प्रसार रुका नहीं अपितु घरेलू अर्थव्यवस्था चरमरा  गई  है ।

विकास कार्यों के लिए  सरकार के पास पैसा नहीं है। आलम यह है कि सरकारी कर्मचारियों की सैलरी काटने का प्रस्ताव दिया गया है।

भारतीय कंपनियों द्वारा IMA (Institute of management accounts) सर्वेक्षण में कर्मचारियो की 20 % छटनी को  दर्शाता है| एक अध्ययन के अनुसार सबसे अधिक पर्यटन, यात्रा उद्योग में 13% की गिरावट और 58% की वेतन कटौती दर्ज की है। तुलनात्मक रूप से, सरकार ने गैर-लाभकारी और शिक्षा क्षेत्रों में कार्यरत पेशेवरों के वेतन में भी कमी की है।

बैंकों ने ब्याज दरो में कटौती कर दी है।

भारतीय रिजर्व बैंक

ने अपने कोविड-19 के एक भाग के रूप में नीतिगत दरों में 4% की कटौती की है इसका मतलब है कि बैंक आर बीआई से बेहद कम दर पर पैसा उधार ले सकता है इसलिए इस बिंदु पर धन को आकर्षित करने के लिए उच्च जमा दरो का भुगतान नहीं करना चाहता है।

आर्थिक स्थिति

लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगा दी है देश के कई लोगों ने अपने नौकरी खो दी है या उनकी मासिक आय में कटौती की गयी है इसीलिए बचत और सावधि जमा दोनों प्रभावित हुए हैं।

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